ॐ श्री जय हंस निर्वाण निरंजन नित्य
आश्चर्य अर्थात अचम्भा है कि न तो भगत है,
न भगवान है अर्थात एक ही रूप है, यानी भगत और भगवान दो नहीं रहे
बल्कि एक रूप हो गये है इसलिए अब किसी को भजने और तजने की बात ही नहीं रही |
सुन-शायर की आशा छुट्टी – साध्य और साधक का भाव न
होकर एक भाव होना
सोच
है तो विचार भी होगा
जब हम किसी बात पर चर्चा करते हैं तो इसका अभिप्राय
यह नहीं है की हम किसी के प्रति अन्याय या न्याय करते
हैं, हमारी चर्चा किसी के
लिए भला क्या न्याय या अन्याय करगी ? क्योंकि जीव के पीछे तो उसके स्वयं के कर्म लगे होते हैं,
अगर कोई किसे के साथ न्याय या अन्याय करता है तो वह जीव के खुद के कर्म हैं भूल से
या अज्ञान के कारण ही ऐसा प्रतीत होता है की एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ
न्याय या अन्याय करता है, कर्म जीव के हैं और फल भी जीव ही भोगता हैं इसमें दूसरे
का योग फल भोग देने के निमित्त ही होता है, यदि एक जीव अन्य से जुड़ा है तो वह अपने
कर्म फल से जुड़ा है जो अन्य के माध्यम से उसे प्राप्त होता है, अगर इसमें अन्य
व्यक्ति यह समझे की मैं उस जीव के कर्म फल का दाता हूँ तो यह भूल है, क्योंकि यह
तो सब जानते हैं , जो करेगा सो भरेगा, ये अलग बात है कि कहने वाले
कुछ ऐसे भी है, जो इस
बात को बार बार कहते है, पर इस
बात में अपना विश्वास नहीं रखते | इसका
स्पष्ट प्रभाव उनके व्यवहार में कथनी और करनी में पड़े
अन्तर
के रूप में देखा जा सकता हैं| चर्चा तो एक भाव की
अभिव्यक्ति का विस्तार है जिसमें
विचार की कल्पना
भिन्न भिन्न रूप रूप ग्रहण करती है और अंत में एक
निश्चित विचार
के रूप में परिवर्तित होकर जीवन में अपनी
जगह बना लेती है | कल्पनाएं अनंत होती हैं
और जीवन में इनका योग बनता रहता है, विचार
की गति को पढ़ना है और
पकड़ पाना कठिन है, फिर भी कोशिश जारी रहती है कि व्यक्ति एक दूसरे के
विचारों को समझे और साथ में यह भी जान
ले, कि एक व्यक्ति के विचार दूसरे से भिन्न
क्यों है? अगर
यह समझ में आया, तो आगे की बात समझने में कोई समस्या नहीं होगी|

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