अनुभव अपना अपना
|| श्री श्री 108श्री सीताराम जी महाराज ||
श्री हंस गीता जी मैं, स्वकिल्लोल के हेत |
भाषा प्राकृत में रचूं, सुने महासुख देत ||१||
भावार्थ – आत्मा
रूप हंस के समान गुणानुवाद को
करने वाली | यहाँ इस हंस गीता को, मैं बालक के
किल्लोल की तरह, अपने
किल्लोल रूप विशेष आनंद
के लिए,संस्कृत से भिन्न, मनुष्य भाषा में रचता हूँ|
जो ब्रह्मानंद रूप महासुख को देने वाली है |
यह तभी सम्भव है, जब कोई इसे षट्लिंग सहित
एकाग्रचित होकर
गुरुमुख से श्रवण करेगा |
|| श्री श्री 108 श्री
हंस साहिब जी महाराज ||
निज अनुभव
आज दिनांक 15 – 08 – 2018 का सीकर सत्संग
थी, कल्याण भारती
जी के शिष्यों ने इस शुभ अवसर
का आयोजन किया था,
वहां जो शब्द-वाणी का गायन हुआ अति उत्तम, अहो!
भाग्य हमारें की हमें ये
सत्संग मिली और जिसके
सुनने से और सुने हुए का मनन करने से, एक ऐसे
विचार का उदय
हुआ, जो है तो निज अनुभव,
जिसको यहाँ प्रकट करने से पहले, महाराज श्री के
सामने रखा जा चूका है| उस निज अनुभव को
स्वकिल्लोल हेतु, एक
बार फिर से प्रकट करने का
शुभ अवसर, हमें यहाँ मिला है|
धन भाग हमारें, यह शुभ अवसर मिला |
हमारा अनुभव कहता हैं कि –
जिन प्रश्नों के कारण हम इतने विचलित थे, उनका
उत्तर यह
अनुभव है |
हमारें प्रश्नों का क्रम इस प्रकार था -
प्रश्न 1. हमें क्यों? ऐसा लगता हैं कि सत्संग की
बातें पूर्ण रूप से समझना,
हमारें लिए कठिन हैं|
प्रश्न 2. आखिर क्यों? जो बातें हम नहीं समझ पाते,
वही
बातें अन्य सत्संगी समझ जाते हैं|
प्रश्न 3. संत-महात्माओं द्वारा लिखे शब्दों का कैसे?
हम अर्थ का अनर्थ कर देते हैं|
प्रश्न 4. किसी अन्य के द्वारा सुने हुए शब्द और
वाणी में
कहा चूक हुई हैं,
हम क्यों नहीं समझ पाते |
प्रश्न 5. शास्त्रों में लिखे शब्द और वाणी की परख
कैसे हो?
ऐसा क्या करें? जिससे प्रेस द्वारा
छपाई के समय, शब्द वाणी में हुई गलतियाँ,
हम भी पहचान सकें |
प्रश्न 6. हमें समझ नहीं आ रहा?
या हम समझना नहीं चाहते हैं,
इतना भी हमें मालूम नहीं?
प्रश्न 7.हमनें गुरु मुख से महावाक्य श्रवण किया हैं,
फिर क्यों? हमें
गुरु वचनों में,
पूर्ण विश्वाश नहीं हो रहा |
प्रश्न 8. हमारी नासमझी! कहीं इस अविश्वास का
कारण तो नहीं
है?
प्रश्न 9. हमारी समझ गलत हैं या समझाने वाले की
समझ सही
नहीं? हमारें लिए यह समझना
कब सहज होगा ?
प्रश्न 10. क्या? ऐसी कोई विधि नहीं, जिससे सब
कुछ (जो जीव
कल्याण के लिए लिखा गया
हैं,जिसे हमने भी सुना और पढ़ा हैं, जिसके
लिए सब अपना मत
रखते हैं, इनमें
सहमति सहज हो जाए)
स्पष्ट हो और सारे मतभेद दूर हो |
विचार मंथन अतीत में इस तरह डूबा –
किसी दिन हमें पारखी का
पता नहीं था, पारखी तो
भाग्य से एक दिन अपने
आप आ मिला,पर क्या
करें? उस समय! हमें परख करने का पता नहीं था,
अनिर्णय की स्थिति
में, श्रवण-मनन आदि कुछ हद
तक कठिन था |
समाने जो थे, हमारे भाग खड़े, परब्रह्म, परमात्म,
जो खुद को कहे, थोड़ी देर के लिए लगा, इनके
बहकावे में क्यों आना? समय की बर्बादी और सपनों
की आबादी हैं, इनका संग |
इनकी
बातों में दम होता, तो सभी इनकी बात मानते |
कुछ लोगों का साथ इनके पास, जो आज है, कल
नहीं, फिर भी! अगर
इनकी बातों में दम हैं, तो इसका
सीधा सा अर्थ होगा, नासमझ हम हैं |
इसीलिए अपने ही भाग्य पर संशय करने लगें, यही
कारण रहा होगा
की इनके सत्य वचन भी मनगढ़त
लगने लगें |
संवाद
भी वाद-विवाद लगें, खैंचातानी प्रगाढ़ लगें,
पहले पहल कुछ न समझ आया?
यह सब क्यों
होता हैं? फिर समय यू ही चलता
रहा,
कभी सत्संग में, कभी घर में, कभी भ्रमण में, उतार-
चढ़ाव रहे जीवन के संग में, कभी लगता था, सब
कुछ समझ गयें हम,
कभी ऐसा लगता रहा, हमारी बातों
कुछ समझ गयें हम,
कभी ऐसा लगता रहा, हमारी बातों
में नहीं दम |
प्रयास फिर भी चलता रहा, कभी ज्यादा
कभी कम,
विचार यही आयें -
भूल क्या रहे हैं? ये नहीं समझ पाएं,
मति अपनी, दर दर ठोकर खाएं |
कुमति घर, सुमति कहाँ? आए,
सत्संग सुख, यू ही बीता जाए |
वाद-विवाद, गले लगाए फिरें उदास,
मन मलिन,कैसे हो? पल में सुवास |
खेल-खेल ही कहिए, कूदे जलती अंगार,
चूक-चूक में सब रहे, सच लगता संसार |
आते-जाते अनंत विचार, उलझन अपार,
स्थिर चितवृति
नहीं, चंचलता व्यापार |
उधार की ये नाव,
डूबी जाए मझधार,
दीन दुखी देख, उबारन
आये करतार |
अब क्यों बैठा रहा?
आया अवसर हाथ,
देर करे पछताए, फिर बनती नहीं बात |
शेष जो रहा वह अगली पोस्ट में प्रकाशित होगा


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