|| ॐ श्री जय हंस निर्वाण निरंजन नित्य ||
समझ कठिन और सरल क्यों?
→ नवीन ज्ञान पूर्व ज्ञान पर आधारित हो, तो समझना
सहज हैं,
लेकिन जरूरी नहीं की हर बार पूर्व ज्ञान, नवीन ज्ञान ग्रहण करने में,
सहयोग करें|
कभी पूर्व ज्ञान के आधार पर, नवीन ज्ञान ग्रहण करने में, हमें बाधा
होती है, कभी पूर्व ज्ञान, नवीन ज्ञान में बाधक भी नहीं होता, तो साधक भी नहीं
बनता
है| इसे ज्ञान का स्थानान्तरण कहते हैं, जो कभी सकारात्मक होता है, तो कभी
नकारात्मक और कहीं दोनों ही स्थितियां नहीं रहती हैं| अर्थात शून्य स्थानान्तरण |
शस्त्रों में लिखा हैं ⇨
“स्वाति बूंद सत् वचनों की वर्षा” इस कथन को
स्पष्ट करने के
लिए हमारें पास क्या हैं, पूर्व ज्ञान| जिसको हमने कहीं न कहीं से
सुनकर, पढ़कर,
देखकर, समझकर या रटकर किसी न किसी तरीके से सग्रहित कर लिया, उसी
आधार पर हम इस कथन का स्पष्टीकरण अथवा व्याख्या करेगें|
व्याख्या का काम है- किसी
शब्द या पद के अर्थ को स्पष्ट करना|
सही व्याख्याकार ⇨
जो शब्द
और पद में, अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ता है|
अर्थात जैसा शब्द या पद
है, उसकी व्याख्या भी उसी से संबंधित रहती हैं| हो सके,
तो अर्थ को सरल करने के
लिए सम्भावित प्रयोग कर सकता हैं, परन्तु अर्थ को ही
पूरी तरह बदल दे, ऐसी व्यख्या
से बचेगा| क्योंकि व्याख्या के द्वारा शब्द या पद के
अर्थ में, अति या कमी करने से,
अर्थ परिवर्तन की सम्भावनाएं ज्यादा रहती हैं| यही
कारण हैं कि जब हम बिना प्रयास अथवा
परिश्रम के, बिना किसी भय के, बिना
किसी प्रमाण के, बिना किसी श्रद्धा के, बिना
समझे, मन मर्जी से, देश, काल, वस्तु
आदि का ज्ञान न रहते हुए भी शब्द या पद की
व्याख्या करते हैं, तो अर्थ का अनर्थ
होना स्वभाविक हैं, अर्थात इस दोष से बचना
कठिन है और जो इस दोष से मुक्त है,
वह सही व्याख्याकार है|
संत महात्माओं द्वारा लिखे शब्द, पद और वाणी आदि➔
मूल रूप में तभी तक
सुरक्षित हैं, जब तक ये सही व्याख्याकार के हाथों में हैं|
महापुरुषों के द्वारा
लिखित शब्द, पद और वाणी आदि के मूल रूप में परिवर्तन ➔
वो भी गलत दिशा में, तो
इसका कारण कोई और नहीं हमारा अबोध ज्ञान हैं|
प्रत्यक्ष रूप में यह देखने
को मिलता हैं-
जब हम किसी काम को लग्न और कठोर
परिश्रम के द्वारा सफल बनाते हैं,
तब हमें हमारी सफलता पर आनन्द की अनुभूति
होती हैं| उस समय हम उनको भी सहर्ष
धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने हमारा सहयोग
किया| जो सहयोग नहीं करते उनको हम याद
नहीं करते हैं, लेकिन जो अकारण ही
बार बार हमारें कार्य में बाधा उत्पन्न करते
हैं, उन्हें हम कभी नहीं भूलते|
बदलें की भावना रखने वाले,
ऐसे लोगों से सही समय
आने पर बदला लेते हैं और दया भाव
रखने वाले, ऐसे लोगों को अज्ञानी समझकर ही काम
चला लेते हैं|
ज्ञानवान ऐसे लोगों को सही दिशा दिखाने की चेष्टा करते हैं|
ये सब
जीवन के कुछ क्षणों में हम सोचते हैं|
तो
उन महात्माओं क्या विचार रहा होगा? जिसके चलते उन्होंने अमूल्य
सत् शास्त्र रच
दिए| क्या? यह जनहित के लिए था| हो सकता हैं, यही अति उत्तम
विचार रहा हो या और भी
बहुत से कारण रहें हो|
आज हमारा अबोध ज्ञान
जो कुछ कर रहा हैं, यह तो उन
महापुरुषों ने कहीं नहीं लिखा की विचार मत करों,
केवल नकल करों| किसी और के लिखे
शब्दों में, हेर फेर करके अपनी संतुष्टि के
लिए, नई रचना तैयार करों| सही शब्दों
में कांट छांट करके उनके अर्थ बिगाड़ना ही
अबोध ज्ञान का धर्म हैं| गलत शब्दों की
तरफ ध्यान देकर उनको सही करना अधर्म
हैं, यदि शब्दों का भावार्थ ज्ञात नहीं, तो भी
कोई चिंता नहीं, जो आता हैं जैसा भी
उल्टा सीधा सब कह दो| शब्द हमारें हैं, तो
क्या हुआ? सभा संचालक महान हैं, भाव
हमारें हैं, तो क्या? हर भाव का अर्थ, सभा संचालक के पास हैं| वक्ता सुनाते हैं,
श्रोता
सुनते हैं| यही परमधर्म हैं, इसके विपरीत जो लगें उसका विरोध करना| यह
संतो की
विचारधारा में कहीं नहीं लिखा और यदि कहीं लिखा भी हैं तो यह अबोध
ज्ञान के विषय
में दिया गया वर्णन मात्र हैं|
अपने बल और कार्य का ज्ञान रखना, हमारें लिए उचित
हैं,
उसी के अनुरूप प्रयत्न हो, यह हमारें लिए
सर्वोत्तम हैं|
ॐ परमात्मा


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