एक और दो के नाम पर भ्रम में रहना क्या सही हैं?



                  ||ॐ श्री जय हंस निर्वाण निरंजन नित्य|| 

रूचि हैं या दोष 

क्योंकि जिसको जो अच्छा लगता है, वह उसी में रूचि रखता है| अत: हमें महापुरुषों 

के शब्द और पद सुनने, पढ़ने, लिखने में रूचि होगी या है, तो इस तरह का विचार 

आना सहज है, हम रूचि रखते हैं, पर यह नहीं पता? जाने अनजाने में, रूचि कब? 

दोष में बदल जाती हैं| 


अर्थ का अनर्थ करना हमारी भूल हैं जिसे चाहें तो सुधार सकते हैं 


जब हमने, महाराज श्री द्वार बताई हुई पद व्याख्या (नाम नहीं, अनाम है) का मनन 

किया, जो पूर्व ज्ञान पर आधारित थी, इसलिए समझने में कठिनाई नहीं  हुई और 

व्याख्य भी सही थी अर्थात नाम के आगे अगर उपसर्ग लगे तो होगा अनाम पर 

हम उत्तर में बेनाम  लिखे या बोले तो इसे भूल ही कहेंगे, इससे हमें जीरो
मिलेगा|


हम भूल को नही सुधारें तो वह गलती में बदल जाती है

अक्सर हमें ऐसा लगता हैं कि हमने जो बोला वही सही हैं और इससे अलग तो हो 

ही नहीं सकता, कभी हम केवल लिखे हुए को ही सही मान लेते हैं, हमारें लिए यह 

मानना सहज हो सकता हैं, इससे हमें कोई कष्ट नहीं होता, यही बात जिसे हम बिना 

किसी जांच परख के माने बैठे हैं, जब किसी अन्य को बताते हैं, तो उसकी भी मति 

भ्रमित होती हैं, यदि बंदा समझने में होशियार हैं, तो वह हमारी कहीं हुई बात को 

नहीं मानता, इससे हमें कष्ट होता हैं, थोड़ी समझ होगी, तो हम उस गलती को 

सुधार लेगें, नासमझ बनकर रहेगें, तो हमें लगेगा की सामने वाला हमारी बात काटने 

की कोशिश कर रहा है| या हो सकता है, हम सामने वाले को ही अपना सहयोगी न 

जानकार, विरोधी समझने लगें, 


रास्ता बताने वाला, हमारी यात्रा खुद तय नहीं करता, उसके लिए हमें तैयार रहना 

पड़ता हैं|  

इस भाग दौड़ भरें जीवन में, अक्सर ऐसा ही होता हैं, जब कोई पीछे से हमारा 

सहयोग करता हैं, वह इसलिए ताकि हम उस कार्य को सहज रूप से कर सकें, जो 

हमारें लिए कठिन हैं, लेकिन जब हमारी नासमझी से कार्य में बाधा हो और काम 

बिगड़ जाए, तो हम अपने आप को बचाने के लिए अथवा स्वयं की गलतियां छिपाने 

के लिए, यह कहकर बात को टाल देते हैं-

“ हमने तो वही किया, जो हमें बताया गया था, फिर भी काम नहीं बना, तो इसमें 

हमारी कोई गलती नहीं हैं, यह तो सरासर उसी की गलती हैं, जिसने हमें आधी 

अधूरी जानकारी देकर, हमारे विश्वाश के साथ खिलवाड़ किया हैं|” 

यह सत्य नहीं केवल स्वयं की संतुष्टि के लिए कही गई बात हैं, इसका अर्थ हैं- या 

तो हम वस्तु स्थिति को नहीं समझ पा रहें, या समझना नहीं चाहतें,  या यह भी हो 

सकता हैं कि हमारे पास सही और गलत का निर्णय करने की युक्ति (उपाय) ही नहीं, 

अत: हमने यह जान लिया हैं कि हर बार गलती सामने वाले की नहीं होती,  हम भी 

हमारी नासमझी के कारण गलती कर सकते हैं| 


केवल समझने भर की देर हैं, फिर तो सब सरल लगने लगता हैं 

सीधी और सरल बात यही हैं कि सब समझ का फेर हैं, अगर समझ आये, तो 

समझने में क्या देर हैं? जी नहीं|

हमारें लिए भेद में अभेद और अभेद में भेद की कल्पना विवाद का विषय नहीं हैं|

प्रकाश और अंधकार, भले ही एक दुसरें की पहचान के कारण बनें हो और चाहें एक 

साथ रहतें हो, फिर भी देश, काल और वस्तु आदि के भेद से उनको भिन्न-भिन्न 

करके ही जाना जाता हैं, इसलिए प्रकाश, प्रकाश ही हैं और अंधकार, अंधकार ही है, 

इस स्थिति में, न तो हम प्रकाश को अंधकार कहते हैं, और न अंधकार को प्रकाश 

रूप मानते हैं, 


भेद ना हो तो क्या कार्य करना सम्भव है

यह भेद ज्ञान ही व्यवहार की सफलता हैं, भेद ही नहीं रहें, तो समझ की क्या 

कीमत? समान रूप में जो हैं, उसके लिए सोचने विचारने की आवश्यकता ही नहीं 

रहती, जब हमें यह पता हो की समान वस्तु हमारें सामने हैं| 


 क्यों असमान वस्तुओं में चुनाव की समस्या रहती हैं?

हमें दुविधा असमान वस्तुओं के कारण होती हैं, असमान वस्तु को देखकर हम 

विचलित होते हैं, प्रतिकूल को अनुकूल बनाने के लिए उन्हें बदलने की भी कोशिश 

करते हैं, यह कोशिश स्वभाविक हैं, इसके साथ यदि वस्तु के स्वभाव को भी लेकर 

चले तो प्रयोग उचित होगा, अन्यथा इसका कोई प्रमाण नहीं की जो वस्तु हम 

बदलना चाहते हैं, वह बदले हुए रूप हमारें लिए लाभदायक ही हो अर्थात हानिकारक भी हो सकती हैं| 


हम अभेद को नहीं भेद सकते तो भेद को तो समझ सकते हैं  

अत: हमारा विचार हमसे यही कहता हैं कि अभेद में संशय कैसा? यह तो सर्वमान्य 

हैं, इसे जानने और मानने के लिए किसी अन्य प्रमाण की क्या आवश्यता? यह तो 

स्वयं की स्वीकृति मात्र हैं, ऐसा क्यों हैं? यह जानना हैं, तो इसका उत्तर भेद ज्ञान 

हैं, 



एक ही समस्या को सुलझाने के कई तरीके हैं, पर तरीका सही हो, तो ही समस्या का समाधान होगा अन्यथा नहीं,


असल में हमारें लिए अभेद एक प्रश्न हैं, आखिर अभेद क्या हैं? इस प्रश्न का 

उत्तर हमें जानना हैं, तो जिज्ञासा स्वभाविक हैं और प्रयत्न में भी देरी नही रहती, 

लेकिन हमें केवल इस प्रश्न का उत्तर देना हैं, या लिखना हैं, ताकि हमें जो कार्य 

मिला हैं, उसे हम सफलता पूर्वक पूर्ण कर सकें, इसके लिए भी हमारी जिज्ञासा हमें 

प्रयत्न में लगाती हैं, 


और इससे यह भी ज्ञात हो जाता हैं, कि खोजी और जो कर्मयोगी का काम एक ही हैं 

खोज या कार्य में कोई कमी नहीं हैं, प्रश्न भी एक ही हैं,

तो शायद उत्तर भी एक ही होगा, क्या यह हर हाल में सही होगा? 

क्या दोनों  प्रश्न एक होने पर भी उत्तर एक नहीं होना चाहिए? 

एक ही प्रश्न का भिन्न भिन्न तरीके से उत्तर देना क्या सही हैं? 

जो हम जानते हैं वही हमारा उत्तर हैं और हम जो नहीं जानते वही हमारा प्रशन हैं|

हमारें लिए प्रश्न भी अज्ञात हैं और उत्तर भी अज्ञात हैं, तो हम कुछ नहीं कर सकते|

यदि हमें प्रश्न का पता हैं और उत्तर हमें ही ज्ञात  नहीं,

 तो हम प्रश्न से संतुष्ट रहेगें, 

पर उत्तर के विषय में कुछ भी नहीं कर सकतें और यदि हमें प्रश्न भी पता हैं, 

उसका उत्तर भी हमारें लिए ज्ञात हैं तो हम दोनों से संतुष्ट हैं| 


हर वस्तु का अपना गुण धर्म होता हैं 

हम जिस वस्तु के गुण धर्म को जानते हैं उसकी परख हम कर ले तो हम पारखी हैं, 

उस वस्तु के जिसकी परख हम कर चुके, लेकिन जिस वस्तु के गुण धर्म हमें ज्ञात 

नहीं, वह वस्तु हमारें लिए अज्ञात हैं, उस वस्तु की परख रखने वाला ही हमें बता 

सकता है कि वास्तव में वह वस्तु क्या हैं? और

जिस का कोई गुण धर्म नहीं उसके लिए पारखी और परख की कल्पना व्यर्थ हैं   

प्रश्न के बिना उत्तर और उत्तर के बिना प्रश्न का कोई मोल नहीं,

अर्थात दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण हैं, यदि हमें प्रश्न भी पता हैं, उसका उत्तर भी  

ज्ञात हैं, तो हम प्रश्न और उत्तर दोनों के विषय में बहुत कुछ कह सकते हैं, उनके 

गलत या सही होने की परख कर सकते हैं, हम ये बता सकते हैं कि चूक कहा हुई हैं 

अगर हम ऐसा करते हैं तो दो का ज्ञान रखने में कोई हानि नहीं, बल्कि हमें तो लाभ ही मिल रहा हैं,  

लाभ और हानि एक ही हृदय के दो भाव हैं|

हमें जो लाभ मिला रहा हैं क्या इसमें हानि नहीं हैं? क्यों नहीं? ऐसा ही हैं, पर हमें 

ज्ञात न हो ये अलग बात हैं, क्योंकी पारखी अपने लिए पारखी नहीं हैं, उसकी परख 

का नजरिया हीरे से जुड़ा हैं, पारखी परख करता हैं, पर पारखी की परख का क्या? 

उसकी परख कौन करता हैं? क्या पारखी की परख करने वाला पारखी से भी ऊँचा 

होता हैं? अगर ऐसा हैं, तो दो दीपक पास में रखें हैं, जगमगा रहें हैं, दोनों ही समान 

हैं. फिर भी उनमें भेद हैं, क्या यह कहना सही हैं? 

क्या यह कहना उचित हैं? पारखी-पारखी में कोई भेद नहीं होता, पारखी केवल पारखी होता हैं, जिसका काम हैं, वस्तुओं की परख करना, तो फिर भेद कहा हैं?

क्यों सभी पारखी एक जैसे नहीं होते हैं? क्या वस्तु भेद के कारण एक पारखी दूसरे 

से भिन्न हैं? क्या इसी कारण उनकी परख में भेद माने तो सही रहेगा? क्या यह 

भेद पारखी होने की कला पर संशय नहीं हैं? 

परख एक ऐसी कला हैं, जो वस्तु भेद के कारण कोयले को सोना तो नहीं बना 

सकती, लेकिन यह प्रमाणित कर सकती हैं की कोयले में सोने के गुण धर्म नहीं हैं, 

अत: कोयला सोना नहीं अर्थात सोने से भिन्न कोई वस्तु है, जिसका नाम कोयला हैं, 

और उसके गुण धर्म भी भिन्न हैं ये सोने के गुण धर्म से मिलान करने पर स्पष्ट 

होता हैं,


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