II ॐ श्री जय हंस निर्वाण निरंजन नित्य II
ᜁ समझ सको तो समझो खुद को ᜁ
सफर हमारा है, साथी भी हम ही सफर के, फिर भी हम सफर के साथ हमेशा नहीं रहते ᛁ
जब बहता दरिया जा मिले सागर में , फिर भी हम सागर को कभी दरिया नहीं कहते ᛁ
जब बहता दरिया जा मिले सागर में , फिर भी हम सागर को कभी दरिया नहीं कहते ᛁ
आज हम उस बात पर चर्चा करते है, जो एक नजरिये से देखे तो सामान्य है,लेकिन गहराई में उतरकर देखे तो, बात और की और ही बन जाती हैᛁ ऐसा क्यों ? आखिर हमारी सोच को हम नहीं जान सके तो कौन जानेगा
कोई नहीᆝइसका कारण हम दूसरों में तलाशते हैं, जबकि हम स्वयं इस बात के लिए जिम्मेदार हैᛁ अब बात करते है की वो बात क्या है? दरअसल जब हम हमारे वास्तविक लक्ष्य से अनभिज्ञ रहते है,तो हमारा जीवन व्यवहार अस्त व्यस्त रहता है और हम उसे स्वयं समझने की बजाय ये चाहते है कि कोई अन्य हमारे व्यवहार को समझे पर ये हर परिस्थिति में संभव नहीं हो सकता हैᛁ अत: हम ये कह सकते है कि जितना हो उतना अपने आप को समझने की कोशिश अगर स्वयं द्वारा की जाए तो ज्यादा सफलता हमारे हाथ लगती है और यही कार्य किसी अन्य के द्वारा किया जाए तो, उसमें सफलता कम या न के बराबर होती हैᛁ क्योंकि हमारी उपस्तिथि ही हमारे साथ हरदम होती है, अन्य कोई हमारे साथ हरदम नही रहता हैᛁ कुछ क्षण ऐसे भी जीवन में आते है, जिनको हमें अकेले बिताना पड़ता हैं यदि उन क्षणों के बारे में भी विचार कर ले, तो हमें हमारे अस्तित्व के बारे में जानने की एक सुगम राह दिखाई देगी, इसके साथ ही हम अन्य के योग को सहज रूप से समझलेगें और हमारा व्यवहार खुद ब खुद व्यवस्थित होने लगेगा ᛁ

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