सुख- दुःख शरीर और मन से संबंधित हैं, जबकि आनंद सकल घट आत्म स्वरूप की अनुभूति हैं |



जो व्यक्ति जीवन के झंझावात में फंसा है, वो कोई 

भी हो उसे उत्साहित और आनंदित होती हमने कम ही पाया हैं |

इसका मुख्य कारण है- संकोच 

यानी लोग क्या कहेंगे....

दूसरा ज्यादातर हम स्वयं को रोजमर्रा के जंजाल से 

मुक्त नहीं कर पाते हैं |

साधरण रूप से देखा जाए तो जीवन में सुख- दुःख 

हमारे लिए ख़ुशी और पीड़ा के स्रोत बने हुए हैं ये 

दोनों अनुभूतियाँ हमें जीवन मे कभी सहज नहीं रहने 

देती, हमें पता हैं कि ख़ुशी और पीड़ा का संबंध मन 

तथा शरीर से हैं, मन और शरीर के अधीन या आधार 

पर चलने वाले जीवन से इनका संबंध गहरा होता है| 

इस तरह के जीवन में आनंद की अनुभूति के क्षण 

कम ही मिलते हैं, जीवन भर हम सुख-दुःख में उलझे 

रह जाते हैं, ऐसे में हमारी जीवन यात्रा उस आत्मानंद 

के बिना ही समाप्त हो जाती जिसके लिए हमें यह 

मानव जीवन मिला है|

जीवन का सार तत्व हमारें लिए हैं, तो हम क्यों 

उससे विमुख रहे? जो हमारा अपना है| उसे जीवन का 

आधार जानकर जीवन यात्रा करें तो जीवन सहज और 

सरल, आनंद से परिपूर्ण हो | 

आनंद का रिश्ता अंतरात्मा से है, आत्मा हमारा 

स्वरूप है, 

फिर  हमें किसी बाहरी वस्तु की अपेक्षा क्यों ?

अमुक वस्तु में सुख है, अमुक वस्तु में दुःख है, यह 

सोच सरासर अज्ञान है, इसके सिवा और कुछ नहीं |

वस्तु में सुख और दुःख की कल्पना हमारी भूल हैं,

वास्तविकता यह हैं कि हम उस वस्तु को निमित्त 

बनाकर अपने ही अंदर के महासागर के सुख का क्षण 

भर अनुभव करते हैं |

आनंद घट तो सबका प्यारा है, हर कोई उसे चाहता 

है, हर कोई उसकी तलाश में है, कईयों ने उसका 

साक्षत्कार कर लिया, कई कर चुकें, कई करेंगे, कई 

कर रहें है| 

जब कोई स्वयं से प्रेम करें और दूसरों में प्रेम बांटें तो 

यह आत्मानंद की प्राप्ति का सीधा और सरल तरीका 

है,

क्योंकि सबको परमात्मा ने बनाया है, उसके द्वारा 

निर्मित जीवों से प्रेम करना स्वयं परमात्मा से प्रेम 

करना है| यही आनंद प्राप्ति का मार्ग है

तुच्छ सफलताओं से दूर रहने का सामर्थ्य 

स्वयं में जागृत करना, 

चैतन्यता की अंतिम अवस्था है|

एकांत में शांतचित बैठकर चिंतन मनन और आत्म-

निरीक्षण करें तो निश्चय ही आनंद की अनुभूति होगी |

जो नि:सग और निर्लिप्त है, 

जिसके मन में आकांक्षा और उत्साह है,

जो कर्म की सिद्धि असिद्धि व लाभ- हानि से ज्यादा 

देर तक विचलित नहीं रहता, 

वही असली ख़ुशी को प्राप्त कर सकता है|

ख़ुशी हासिल करना जीवन की समझ और प्राप्त 

साधनों के सही प्रयोग पर निर्भिर है,

सचमुच, हँसी पर ज़िंदगी कायम है| हां इसका ध्यान 

रखना जरूरी है कि हँसी सकारात्मक हो, व्यंग्य 

आधारित न बन जाए.....|

ऐसा संभव हुआ, तो यह आध्यात्म से आनंद की 

बरसात हैं|

वाणी और व्यवहार में रस ..... और इस रस तथा 

मिठास का मिलना भीतरी संतोष को जागृत कर देता 

है, हँसी चुम्बक  की तरह है, जो सामने वाले के 

भीतर छुपी ख़ुशी को अपनी और खींचकर उसे भी 

समानधर्मी बना देती है, जिससे  सहज आनंद की 

अनुभूति होने लगती है|

अत: हमें अपने जीवन में चीजों के बजाय अपने तौर- 

तरीके बदलनें हैं, अक्सर हम संतोष हासिल करने के 

लिए चीजों को जल्दी जल्दी बदलना चाहते हैं, लेकिन 

अपने तौर- तरीको में परिवर्तन नहीं लाते | इस प्रकार 

का जीवन जीना मूर्खतापूर्ण हो सकता है, विवेकपूर्ण 

जीवन में खुशिया और आनंद स्वत ही आएंगे |

अपने मित्र खुद बनें |

अपेक्षाएं कम कर दे |

चाहें जैसी भौतिक शक्ति या जिम्मेदरियां और 

चुनौतियां हमारें सामने खड़ी हो एक निश्चित समय 

के बाद उन्हें बोझ न समझें, उनके बीच ही ख़ुशी तलाशें |

दुनियाभर का बोझ सिर पर उठाये रखने की जगह 

जिम्मेदारी और दुनियादारी को कलात्मक रूप से 

निभाएं |

इससे आनन्द की बारिश यकायक होने लगेगी मन देर 

तक उसमें डूबा रहेगा |

  




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