जाका आदि अंत मध्य नाहिं, सो सत् चित आनंद रूप सदाई|
1. संस्कृत में ब्रह्मन्
कहतें हैं|
2.हिन्दू वेद परम्परा, वेदान्त और उपनिषद दर्शन में यह सारे विश्व का परम सत्य है|
3.जगत् का सार है।
4.सर्वव्यापी, सकल घट की आत्मा है|
5. विश्व का कारण है|
6. विश्व की उत्पत्ति का आधार है|
7. विश्व की स्थिति का आधार
है|
8. विश्व के लय का आधार है|
9. एक और अद्वितीय है।
10.स्वयं ही परमज्ञान
है|
11.प्रकाश-स्त्रोत की
तरह रोशन है।
12. निराकार, अनन्त, नित्य और शाश्वत है।
13. ब्रह्म सर्वशक्तिमान
और सर्वव्यापी है।
परब्रह्म या परम-ब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जो निर्गुण और असीम है।
"नेति-नेति" करके इसके गुणों का खण्डन किया गया है, पर ये असल में
अनन्त सत्य, अनन्त चित और अनन्त आनन्द है।
परमात्मा :-
शब्द दो शब्दों ‘परम’
तथा `आत्मा’ की
संधि से बना है।
परम का अर्थ सर्वोच्च एवं आत्मा से अभिप्राय है चेतना,
जिसे प्राण शक्ति भी कहा जाता है।
ईश्वर शब्द में :- संस्कृत की ईश् धातु (मूल शब्द) का अर्थ है- नियंत्रित करना
और इस पर वरच् प्रत्यय लगाकर यह (ईश्वर) शब्द बना है।
इस प्रकार मूल रूप में यह शब्द नियंता के रूप में प्रयुक्त हुआ है।
आत्मा या आत्मन् पद
भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रत्ययों (विचार) में से एक है।
यह उपनिषदों के मूलभूत विषय-वस्तु के रूप में आता है।
जहाँ इससे अभिप्राय व्यक्ति में अन्तर्निहित
उस मूलभूत सत् से किया गया है,
जो कि शाश्वत तत्त्व है,तथा मृत्यु के
पश्चात् भी जिसका
विनाश नहीं होता।
जो
अस्ति भांति प्रिय
है|
आत्मा घट और परमात्मा सकल घट कहें,
ईश्वर गुण धारी और ब्रह्म निर्गुण उचारी


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