अयम् आत्मा ब्रह्म - "यह आत्मा ब्रह्म है" ( माण्डूक्य उपनिषद 1/2 - अथर्ववेद )
अयं आत्मा ब्रह्म - अथर्ववेद वेद का महावाक्य है की..जहाँ से तुम्हारा ‘मैं’
‘मैं’ उठता है
वो ही तुम्हारा आत्मा परमात्मा है..
आत्मा या आत्मन् पद भारतीय दर्शन के महत्त्वपूर्ण प्रत्ययों (विचार) में से एक है।
यह उपनिषदों के मूलभूत विषय-वस्तु के रूप में आता है, जहाँ इससे अभिप्राय व्यक्ति में अन्तर्निहित उस मूलभूत सत् से किया गया है, जो शाश्वत तत्त्व है तथा मृत्यु के पश्चात् भी जिसका विनाश नहीं होता।
आत्मा का निरूपण श्रीमद्भगवदगीता में इस तरह किया गया है कि -
- आत्मा को शस्त्र से काटा नहीं जा सकता,
- अग्नि उसे जला नहीं सकती,
- जल उसे गीला नहीं कर सकता और
- वायु उसे सुखा नहीं सकती।
- जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नवीन शरीर धारण करता है।
‘अयम् आत्म ब्रह्म’ :- इस कथन को जानने का प्रयत्न करें तो इसमें तीन शब्द हैं- अयम्, आत्म तथा ब्रह्म।
परंतु यह तीन बातें इसमें नहीं हैं-
पहली हम अपने आपको शरीर समझतें हैं.......स्थूल ज्ञान, .
फिर हम अपने आप को मन करके समझतें हैं.......सूक्ष्म ज्ञान का,
जहाँ शरीर और मन दोनों काम नहीं करतें, वहां हम अपने आप को गहन निद्रावस्था में समझतें हैं.....अज्ञान
हम अपने शरीर से काम करते हैं,
मन से विचार करते हैं,
इन दोनों का साक्षी रूप आत्मा है।
जागृत अवस्था में हम व्यक्तिगत रूप से पूरा विश्व हैं,
स्वप्नावस्था में हम तेजस रूप हैं,
निद्रावस्था में हम प्रज्ञास्वरूप हैं|
अर्थात आत्मा का ब्रह्म में लय होने से साक्षी भाव भी नहीं रहता....
अज्ञानता की गांठ को खोल कर देखें, तो ज्ञान की रोशनी भेद मिटाती है, भ्रम खत्म करती है,
आत्मज्ञान के बाद नफरत नहीं शाश्वत प्रेम ही रहता है ।
मानव की प्रकृति( भिन्नता के कारण कल्पित क्षणवाद की सत्यता) मौसम के अनुसार बदलती है अर्थात यह बदलाव (कुछ का कुछ होकर, कुछ भी नहीं होना, फिर भी सब कुछ होना) एक अटल सत्य है,
लेकिन सत्य फिर भी नहीं बदलता अर्थात अस्तित्व कभी मिटता नहीं,
क्योंकि बदलाव क्षणवाद की कल्पना से जुड़ा होकर भी सत्य के आधार पर खड़ी कल्पना हैं,
जैसे :- समुद्र का का लहरों और नदियों आदि में बदलनें से समुद्र या उसका पानी मिटता नहीं| परमतत्व की प्राप्ति स्वयं सिद्ध है, उसमें हेर फेर क्षण मात्र के लिए भी नहीं होता, पर ज्ञान अज्ञान कर छुपा हैं, तो अज्ञान ज्ञान कर खुला हैं-
इसलिए..... ना होना.......होना.......फिर ना होना.......फिर होना.... फिर भी ना होना................
फिर भी होना.............
ऐसा खेल चमत्कार ही तो है,
इसलिए चमत्कार करनें वालें के होने में कोई संशय कैसा?
संसार बदलता हुआ प्रतीत होता है,
पर संसार को बदलनें वालें में बदलाव........ समझना क्या उचित है?
इस संसार की प्राप्तियां जीवन हैं, तो अप्राप्तियां भी जीवन ही है,
यही जीवन की व्यापकता हैं|
मूल तत्व का बोध ही अस्तित्व की पहचान है,
मैं शरीर नहीं... मैं आत्मा..... परमात्मा का अंश हूँ|
परमात्मा न हिंदू है, न मुस्लिम है, न सिख, न ईसाई है न ही यहुदी है,
अर्थात यह सब शरीर के बंधन हैं और परमात्मा इन बंधनों से मुक्त हैं,
जैसे :- आकाश निर्लेप है, ऐसे ही परमात्मा का स्वरूप निर्लिप्त है|
ब्रह्म महाआकाश है, तो आत्मा घटाकाश |
आत्मा का मोक्ष ब्रह्म में लीन हो जाना है,इसीलिए कहते हैं कि ब्रह्म सत्य है,
जगत मिथ्या हैं, यही सनातन सत्य है।
इस शाश्वत सत्य को जानने या मानने वाला ही सनातनी कहलाता है।
जैसे :- सूर्य बादलों से ढंका रहता है, वैसे ही आत्मा रूपी सूर्य जड़ प्रकृति के तत्वों से ढंका हुआ रहता है।
अविनाशी शब्द में सुरति जोड़कर अभ्यास करने से,
ब्रह्म रूप सूर्य की किरणों से,
ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट होती है|
यह योग अग्नि भी कही जाती हैं।
योग अग्नि भौतिक सूर्य की अग्नि व यम की अग्नि से भी तेज होती है-
जैसे :- सूर्य के उदय होने पर बिजली के बल्ब आदि की रोशनी शून्य हो जाती है,
उसी प्रकार योगी, जब योग अग्नि को प्रकट कर लेता है,
तब जड़ प्रकृति के वे सभी सूक्ष्म तत्व जल कर भस्म हो जाते हैं,
जिन्होंने आत्मा के प्रकाश को रोक रखा था,
फिर आत्मा रूपी सूर्य की रोशनी प्रज्वलित हो जाती है।
चित्त की समग्र वृत्तियां जो संसार की तरफ लग रही थी,
अब मुड़ कर आत्माभाव की तरफ एक धारा में प्रवाहित होने लग जाती है, फिर
मन का अहंकार समाप्त हो जाता है,
आत्मा के यथार्थ स्वरूप का बोध होने से,
प्रकृति रूपी पत्नी का जड़ प्रभाव समाप्त हो जाता हैं और
वह (प्रकृति) आत्मा रूपी पवित्र पुरुष पति में समा जाती है।
अर्थात् प्रकृति का रूहानी पवित्र भाग आत्मा रूपी पुरुष में एकाकार हो जाता है,
यही आत्मा व परमात्मा का मिलन है और यही पतिव्रता धर्म भी है।


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