हमारी यात्रा शब्दों
का खेल हैं और शब्दों में भाव हम भरतें हैं, तो आज हम संसार को लेतें हैं, क्या हैं संसार? क्यों है ? संसार,
कैसे है? संसार,
किसलिए है?
संसार,
किस के लिए है?
संसार,
कहा है? संसार
सब से है?
संसार,
कब तक है?
संसार,
आदि ऐसे कई विचार
हैं, इनमें भी हम और हमारा विचार
एक हैं, पर अनेक विचारों के गोल घेरें में घिरा हुआ हमारा विचार हैं, जो हमें ही नजर नहीं आता, आखिर हम किस विचार को अपनी खोज का आधार बनाएं, क्योंकि संसार तो
है, यह तो हमें प्रत्यक्ष दिखाई
दे रहा है, इसमें भला कैसा संशय?
यह तो हम भी खुले दिल से कहतें हैं कि
संसार हम देख रहें
हैं और संसार हमारी नजरों के सामने हैं,पर यह नहीं पता क्या संसार हमें भी देख रहा है?
या इसके पास हमें
देखने वाली आँखें ही नहीं हैं,
यदि ऐसा ही है,
तो जिसे हम देख सकतें हैं, वो हमें देखनें में भी सक्षम नहीं, क्योंकि उसके पास तो हमें देखनें वाली आँखें ही
नहीं हैं, फिर इस संसार में हमें और
कौन दे सकता हैं, संसार तो हमें देख
ही नहीं रहा, क्या हम ही हमें देख
रहें हैं? तो फिर यह आप कौन हैं? जिसका हम इजहार करतें हैं और हम ही विचार करतें हैं,
क्या यह हमें नहीं देख सकतें हैं, अगर यह हमें देख नहीं सकतें, तो हमें आप में भी अंतर लगने लगेंगा, यदि आप हमें देख सकें ऐसी आँखें आप के पास भी हैं,
तो हमें यह ज्ञात हो जायेंगा की आप हम को और हम
आप को देख सकतें हैं, यह बात अगर सिद्ध
हो जाए, तो संसार को प्रकट करने की
आवश्यकता ही नहीं, वह तो अपने आप प्रकट
हुआ है, हम जिस पर निगाहें जमा कर
बैठे हैं तो हो सकता है, हम पर भी कोई अपनी निगाहें जमाकर बैठा हो, केवल हमारें देखनें भर की देर है, क्या पता हम उसे खोजे और हमें वो मिल जाए ?
तो हमें हमारें बचें खुचें प्रश्नों का भी उत्तर
मिल जाएगा, ऐसा इसलिए है, हम जिसे देखतें हैं रहें हैं देख सकतें हैं वो तो
हमें नहीं देख रहा और न ही देख सकता, पर हम जिसे नहीं देख रहें हैं और नहीं देख सकतें हैं, अगर वो हमें देख सकता है और देखा रहा है, ऐसे देखने वाला है, अगर कोई? तो वह हमारें बारें
में सब जानता है, उससे तो कुछ भी छुपा
हुआ नहीं है, इसलिए हमें जानेनें
वाला, हमारें प्रश्नों को भी जानता
है, जो बिना बताय प्रश्न को जान
लें, उससे उत्तर भी नहीं छुपा हैं
अर्थात वह हमारें हर प्रश्न का उत्तर अपने पास रखता और वक्त आने पर उनको हमारें सामने रखता है, हम संसार को जानतें हैं, यह हमारें लिए अज्ञात नहीं, अत: इस पर ज्यादा विचार नहीं करना, हमें केवल उसे जानना हैं, जिसे कोई नहीं जानता और जो हमें भी जानता हैं, पर हम से ज्यादा भला हमें कौन जान सकता है?
यह बात भी सही हो सकती है, क्यों नहीं? खुद का ज्ञाता खुद?
इसलिए तो कहें जातें हैं खुदा
नाम एक तुम्हारा, यकीन नहीं होता यह
हमारी पहचान हैं, हम तो एक अलग नाम
और अलग पहचान के धनी बनकर मस्त हैं, हमें यह नाम और पहचान कैसे मिले, वो भी बिना जान पहचान के अर्थात हम तू उसे नहीं जानतें, जिसने हमें यह पहचान दे कर, आप बिना पहचान के ही सब कुछ कर रहा हैं|

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