संसार की उत्पत्ति और लय के
लिए तीन कारण हैं,
इसमें पहला कारण माया है :- इसे उपादान कारण कहतें हैं,
यह कारण केवल कारण मात्र है,
जैसे :- माटी स्वयं कोई कार्य नहीं करती है, लोग उसे कार्य करनें के लिए काम में लेते हैं, अत: इससे हम कार्य करतें हैं, हम हैं और माटी भी है, इस प्रकार दोनों (माया और ईश्वर) की उपस्थिति हैं, फिर भी उपस्थिति मात्र से भी, कोई कार्य नहीं होता हैं,
क्योंकि कार्य करने के लिए आपस में मिलाप आवश्यक है, अत: माटी (माया) के सहयोग से हम (ईश्वर) हमारी कला को एक नया (सोच विचार व्यवहार आदि रूपों में सत्व गुण का प्रकट होना) आधार प्रदान करतें हैं,
हमारी कला का आधार जिस आधार पर टिका है, उसे उपादान कारण (माया) कहतें हैं और हम हमारी कला (करनें की शक्ति) को अर्थपूर्ण बनानें के लिए माटी (माया) को काम में लेतें हैं और जब तक हमारा काम पूर्ण नहीं होता, तब तक हम माटी (माया) के साथ रहकर हमारा काम करतें हैं अर्थात हम माटी को चाक (समय की गति- काल चक्र) पर रखकर घुमातें हैं,तो माटी स्वत: ही घड़े में बदल जाती है,
इसलिए हम भी केवल निमित कारण ही कहें जातें हैं,
क्योंकि हम तो अपनी कला के आधार पर अपने कर्तव्य का पालन करनें के लिए कार्य शुरू करतें हैं और उसी आधार पर उस कार्य को तब तक करतें रहतें हैं, जब तक वह पूर्ण नहीं होता और जब कार्य पूर्ण हो जाता हैं, तो माटी घड़े का आकर ले लेती है, हमारी कला से घड़े का निर्माण हुआ हैं, इसलिए हम भी उसके कर्ता हैं, लेकिन नाम मात्र के ही-
इसमें पहला कारण माया है :- इसे उपादान कारण कहतें हैं,
यह कारण केवल कारण मात्र है,
जैसे :- माटी स्वयं कोई कार्य नहीं करती है, लोग उसे कार्य करनें के लिए काम में लेते हैं, अत: इससे हम कार्य करतें हैं, हम हैं और माटी भी है, इस प्रकार दोनों (माया और ईश्वर) की उपस्थिति हैं, फिर भी उपस्थिति मात्र से भी, कोई कार्य नहीं होता हैं,
क्योंकि कार्य करने के लिए आपस में मिलाप आवश्यक है, अत: माटी (माया) के सहयोग से हम (ईश्वर) हमारी कला को एक नया (सोच विचार व्यवहार आदि रूपों में सत्व गुण का प्रकट होना) आधार प्रदान करतें हैं,
हमारी कला का आधार जिस आधार पर टिका है, उसे उपादान कारण (माया) कहतें हैं और हम हमारी कला (करनें की शक्ति) को अर्थपूर्ण बनानें के लिए माटी (माया) को काम में लेतें हैं और जब तक हमारा काम पूर्ण नहीं होता, तब तक हम माटी (माया) के साथ रहकर हमारा काम करतें हैं अर्थात हम माटी को चाक (समय की गति- काल चक्र) पर रखकर घुमातें हैं,तो माटी स्वत: ही घड़े में बदल जाती है,
इसलिए हम भी केवल निमित कारण ही कहें जातें हैं,
क्योंकि हम तो अपनी कला के आधार पर अपने कर्तव्य का पालन करनें के लिए कार्य शुरू करतें हैं और उसी आधार पर उस कार्य को तब तक करतें रहतें हैं, जब तक वह पूर्ण नहीं होता और जब कार्य पूर्ण हो जाता हैं, तो माटी घड़े का आकर ले लेती है, हमारी कला से घड़े का निर्माण हुआ हैं, इसलिए हम भी उसके कर्ता हैं, लेकिन नाम मात्र के ही-
जैसे :- व्यपारी का व्यापार तो उसकी कला से प्रसिद्ध होता हैं और व्यापारी का व्यापार भी उसकी कला से उसके नाम पर चलता है, लेकिन यहाँ व्यापार टिकता उत्पादन के दम पर है, यदि उत्पादन ही ना हो, तो व्यापार कैसा? और यदि उत्पादन का महत्व ही ना रहें, तो व्यापार कैसा? उत्पादन खंडित हो, तो व्यापार कैसा? अत: व्यापार और व्यापारी केवल निमित मात्र हैं, जड़े तो उत्पादन पर टिकी हैं,
इस घड़े में माटी अब भी अपना अस्तित्व कायम रखें हुए हैं, अत: बिकती माटी हैं, घड़े के नाम से और खरीदी भी माटी ही जाती है, वो भी घड़े के नाम से,
हम तो केवल अपना कर्तव्य पालन करतें हैं,
हम नहीं बिकतें, हम नहीं खरीदें जातें,
क्योंकि हम तो केवल नाम के व्यापारी हैं, घड़े बनाना और बेचना हमारा काम हैं, हम तो केवल निमित मात्र हैं,
हम से ज्यादा तो इस घड़े पर उनका हक बनता हैं, जो इसे खरीदतें हैं, क्योंकि हमने इस घड़े को जिस अर्थ के लिए बनाया था, उस अर्थ के अनुरूप यह बनकर तैयार हैं,
हमारा और इस घड़े का यही तक का साथ हैं, इस से आगे घड़े के साथ क्या होगा, यह सोचना हमारा काम नहीं, यह कार्य घड़े के मालिक का है और इस समय घड़े का खरीददार ही घड़े का असली मालिक है,
वो इस घड़े को काम में ले या ऐसे ही रखे, इससे हमें क्या लेना-देना, हम उसके धर्म के विषय में कुछ नहीं कह सकतें, यह तो उसके अपने मत के अनुसार होने वाला काम हैं, तो हम क्यों विचार करें?
केवल विचार करने से या उपस्थिति मात्र से कार्य होता, तो कर्म करने की जरूरत ही नहीं होती और सभी कार्य अपने आप ही होते, पर ऐसा संसार में होता नहीं, क्योंकि संसार अपने नियमों के अनुसार चलता हैं, यहाँ एक जब तक, दूसरे से न मेले तब तक, कोई कार्य अर्थपूर्ण नहीं होता, यह भी तय हैं की बिना अर्थ के कोई कुछ भी नहीं करता है,
इससे ज्ञात होता हैं की संसार की रचना का भी अपना कोई कारण जरुर हैं, इस कारण को जाने बिना कार्य अर्थपूर्ण नहीं होता और जो अर्थपूर्ण न हो उसके पीछे अनर्थ छुपा रहता हैं और जो अनर्थ को देने वाला हैं, उसके पीछे अर्थ छिपा रहता हैं, इसलिए इसे समिलत कारण कहतें हैं,
जिसमें अर्थ की प्रधानता देखतें हुए अनर्थ भी प्रधान होता हैं क्योंकि बिना अर्थ (सत्) के अनर्थ (माया) उपजता ही नहीं और बिना अनर्थ (माया) के अर्थ (ईश्वर) की कल्पना (घड़ा) नहीं होती,
यह घडा तो अति सुंदर है, पर यह माटी किस खान की है, हमें नहीं पता, हम केवल इतना जानतें हैं कि यह घड़ा माटी से बना हैं और इसको बनाया भी कुम्हार ने है, उस कुम्हार ने किस खान की माटी से इस घड़े को बनाया है, हमें नहीं पता?
हमनें तो इसे बिना सोच विचार के, केवल समय की कमी को देखतें हुए, जल्दी में ही खरीद लिया हैं, अब विचार करनें से क्या फायदा?
अब तो इसे काम में लेतें हैं और देखतें हैं यह सही सलामत है या नहीं? कही कार्य के लायक ही नहीं रहा हो,
अरे! यह क्या हुआ? इसमें तो पानी ही नहीं रुकता, कितना पानी व्यर्थ चला गया!
हम यह घडा नहीं रख सकतें, क्योंकि इस को जिस कार्य के लिए बनाया गया था, उस कार्य को करनें में भी यह सक्षम नहीं, तो इसकी आवश्यकता तो अपने आप ही खत्म हो गई है,
अब और हम कर भी क्या सकतें हैं? इसे यहाँ से हटाना ही पड़ेगा, क्योंकि इसमें गलती कुम्हार की भी नहीं, उसे तो जिस खान की माटी मेलेगी, वह तो उसी खान की माटी को अपनी काला से काम में लेगा,
शायद कमी माटी की गुणवता में हो क्या पता? नहीं? यह सही नहीं हैं?
यह तो माटी है, घड़े के आकर में है, इसलिए हमें भ्रम हुआ हैं की यह अर्थवान नहीं रही, यह तो पहले से ही अर्थवान नहीं थी,
इसको अर्थ देनें वाला कुम्हार था, उस कुम्हार से यह घड़े के रूप में, यह हमें मिली और हमारें हाथों से (समय की कमी और कार्य की जल्दी के कारण) इस माटी के घड़े का आकर नष्ट हो गया,
तो क्या हुआ? हमें यह मुफ्त में नहीं मिली, हमनें भी इसे खरीदा हैं, इसलिए इसके साथ हमारा लाभ नहीं पर हानि का योग था, नहीं? यह तो कल्पित आकर है, इस का लाभ और हानि क्या लेना- देना, यह विचार तो हमारें अपने हैं, एक विशाल हृदय के दो सहज भाव, जो हमारी इच्छा से आतें-जातें रहतें हैं, हमारा इन भावों से लाभ ही नहीं हुआ तो हानि को हम क्यों माने हानि भी हमारी नहीं, हम तो अब भी ज्यूँ के त्यूं हैं,
हमारें अज्ञान के कारण घड़े का आकार ठकरी में बदल गया, यह अपने मूल रूप में न रहकर एक परिवर्तित रूप में है, और यह प्रकृति (नाम रूप प्रपंच) का नियम हैं,,
जिसमें उत्पत्ति स्थति और लय का होना स्वभाविक हैं, इसलिए अर्थ अनर्थ में समाहित होता है, यही इसका आदि और अंत हैं,
कार्य का पहला आधार (माया) हैं, इसके बिना कार्य संभव नहीं है,
दूसरा कारण कुम्हार (ईश्वर) है, जिसने इसे आधार बनाकर निमित कारण स्वयं बना हैं,
यह कारण (ईश्वर) पहले कारण (माया) के आधार पर कार्य को एक सुव्यवस्थित आकार (रूप) और नाम देता हैं,
अर्थात पहले से प्राप्त आधार (माया) को नया आधार देने वाला ईश्वर है,
जो केवल निमित कारण है,
अर्थात यह कार्य का आरम्भ करता है, उसे संचालित करता है, कार्य को पूर्ण करता है,
फिर भी कार्य से अलग अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखता है,
तीसरा कारण पहले के दो कारणों (पहला कारण :- जिसके आधार पर कार्य किया जाता हैं, और दूसरा कारण :- जिसके द्वारा कार्य किया जाता हैं) का भी कारण ( स्वयं कर्ता) हैं,
अर्थात कारण और कार्य दोनों इससे ही उत्पन्न होतें हैं और इसमें ही स्थित रहतें हैं,
फिर से इसमें ही लय हो जातें हैं होतें हैं, यही निरंतर होता रहता हैं, इसलिए इसे समिलत कारण कहतें हैं-
उपादान- जगत्, माया और माया का कार्य
निमित- ईश्वर, और ईश्वर का कार्य
समिलत- माया सहित ईश्वर और इनका कार्य( असत् और सत् करकें) रूप संसार ( जड़ में चेतन का
आभास रूप कार्य का होना और मिटना)
गुणों की व्यवस्था संसार के आरंभ से अंत तक रहती
हैं संसार और संसार के कार्यों का संचालन संसार में व्याप्त तीन गुणों के प्रभाव से
होता है यह सारा संसार पांच तत्वों से बना है इन पांच तत्वों के तीन गुण हैं- सतोगुण,
रजोगुण और तमोगुण।
किसी अमुक समय पर
इन गुणों में से किसी एक गुण की हमारे जीवन और वातावरण में प्रधानता रहती है। यही तीन
गुण हमारी चेतना की तीन अवस्थाओं- जागृत अवस्था, सुप्तावस्था और स्वप्नावस्था से भी संबंधित हैं।
दोहा -
तीन गुनन की बादरी,
ज्यों तरुवर की छाहिं |
ज्यों तरुवर की छाहिं |
बाहर रहे सौ ऊबरे,
भींजैं मंदिर माहिं ||
भींजैं मंदिर माहिं ||
भावार्थ-
तीन गुणों वाली माया के नीचे ही सभी प्राणी सांस ले रहे हैं। यह एक तरह का वृक्ष है जो इसकी छांव से बाहर रहेगा वही भक्ति की वर्षा का आनंद उठा पायेगा।


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