|| ॐ श्री जय हंस निर्वाण निरंजन नित्य||
दुनिया में अनंत प्राणी हैं, इतने कि गिनती नहीं की जा सकती, इन सब जीवों में मनुष्य तन ही मोक्ष का पात्र है, क्योंकि उसकी अपनी विशेषताएं है, जो विशेषताएं मनुष्य में हैं , वे दूसरे प्राणियों में नहीं हैं, मनुष्य की अपनी तीन मौलिक विशेषताएं हैं - विचार , वचन और व्यवहार,
विचार करने की जो क्षमता मनुष्य में है , वह किसी दूसरे प्राणी में नहीं है, हमनें मनुष्य शरीर धारण किया हैं या हमें यह शरीर मिला हैं, इसका विचार तो अपने आप में होता रहता हैं, पर उस विचार, वचन और व्यवहार का क्या करें? जो उलझन और सुलझन की तरह बार बार आता और जाता हैं, हम हर विचार पर अपना एक विचार रखें तो इसमें हमारी समझ से तो कोई आपति नहीं हैं, पर अन्य को समझाने के लिए हमें अपने विचारों में कितना फेर बदल करना पड़ता हैं , यह हमें भी नहीं मालूम? बात यही आकर नहीं रूकती, बल्कि दूसरों की नजर में हमारी एक छवि या धारणा भी घर कर जाती हैं, उस धारणा का आधार हमें प्रभावित करें या ना करें, पर जो धारणा बनातें हैं, उनके लिए यह लाभ या हानि का विषय हो सकता हैं, क्योंकि संसार में अनंत विचारधाराएँ हैं और सभी का सभी के प्रति एकमत होना या सभी का सभी के प्रति असहमत होना दोनों ही बात पूर्णत: सत्य नहीं हैं, इसका भी अपना एक कारण है, संसार के सभी मनुष्य समान रूप से एक स्वभाव वाले नहीं होतें, यह नियम संसार के नियमानुसार कर्म फल में बाधा हैं, इसलिए इस नियम का संसार के नियम में ना होना ही अपने आप सिद्ध होता हैं, अत: इस पर खेद करने की कोई आवश्यकता नहीं, यह संसार अपने आप में अनंत की अभिव्यक्ति हैं, इसलिए यह अंत रहित हैं, इस अंत रहित संसार का अंत नहीं, पर यह शांत भी रहता हैं, यह भी इसका ही रूप हैं, इसमें हलचल पैदा करने वालें प्राणियों के लिए यह संसार विशाल हो सकता हैं, फिर भी इस विशाल संसार में भी उनका एक छोटा-सा संसारहैं, जिसे प्राणी स्वयं आबाद करता हैं, बर्बाद करता हैं और फिर से बना लेता हैं, क्योंकि यह उसकी अपनी मर्जी से उपजता हैं, रहता हैं, उजड़ता हैं, फिर भी नाम किसी और का हो जाता हैं, कारण कोई और ही बन जाता हैं, क्योंकि जब ईश्वर रचित संसार के पीछे ही कारण और कार्य छुपें रहतें हैं तो क्या? मनुष्य किसी ईश्वर से कम तो हैं नहीं, जो उसका संसार बिना कारण ही कार्य करता रहें, नहीं? कारण तो मनुष्य ने भी बनाएं हैं, अपने संसार के लिए,
फर्क केवल इतना ही हैं की यह संसार अपनी मर्जी का हैं,
इसलिए इसके कारण भी अपनी मर्जी के हैं,
अत: इस विशाल और अंत रहित संसार से पूरी तरह मेल नहीं खातें हैं,
इसलिए उनमें बदलाव भी मनुष्य की मर्जी से होता हैं,
ऐसा होना तो स्वभाव में होता हैं,
इसलिय इसका भी समाधान स्वभाव में ही छुपा रहता है
हम अपने विचार को किसी एक विचार से बांधकर रखेंगे तो हमारें विचार ही हमारें लिए हमारा संसार बनकर रह जाएगा और यदि हम अपने विचार की तुलना किसी अन्य के विचार से करनें लगेंगे तो हमारा संसार ही उजड़ जाएगा क्यों कि विचार केवल विचार हैं यह आता जाता हमारी नजरों के सामने से है पर इसका निर्माण परिस्थियाँ करती हैं इसलिए हम कभी सुखद तो कभी दुखद अनुभव करतें हैं, हम हमारें विचार पर ही विचार करें तो परिस्थियों को समझतें हुए विचार से ही विचार का समाधान हो जाता हैं फिर सारें अनुभव समभाव में समाहित हो जातें हैं |

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