यह महावाक्य- सामवेद से लिया गया है।
तत्वमसि - "वह ब्रह्म तु है" छान्दोग्य उपनिषद में यह सूत्र दिया गया है।
तत्वमसी: ये चौथे वेद का वचन हैं कि जिस सुख को, सामर्थ्य को, मुक्ति को, भगवान को तू खोजता है, वो तत्व तू ही है; वो तत्व तुझ से अलग नही है।
इसका शाब्दिक अर्थ है - "वह तुम ही हो"
इस एक वाक्य का पूरा अनुसंधान कर ले, तो जीवन की परम स्थिति सहज (अपने आप में) हैं,
इसलिए इसको महावाक्य कहते हैं।
तत्त्वमसि पर्याप्त वेद है अर्थात यह महावाक्य, जिस वेद से लिया गया हैं, उस वेद का सम्पूर्ण सार इस में समाहित हैं- जैसे :- पेड़ का सार फल में संग्रहित होता है।
यह गणित जैसा सूत्र है- इस सूत्र से यह ज्ञात होता है कि परमात्मा और आत्मा दो नहीं एक हैं
इतना ही सार है समस्त वेदों का, फिर बाकी सब फैलाव है।
इसलिए इस तरह के वाक्य को उपनिषदों में महावाक्य कहा गया है।
शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है।
इस मठ में दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद 'तीर्थ' और 'आश्रम' सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है,
जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है।
इस मठ का महावाक्य है 'तत्त्वमसि' तथा इसके अंतर्गत 'सामवेद' को रखा गया है।
शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे,
हस्तामलक शंकराचार्य जी के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे।
ब्रह्म और जीव मुलत: और तत्वत: एक हैं, अज्ञान के कारण भिन्न भिन्न नजर आतें हैं अत: अंतर का कारण अज्ञान हैं, जीव की मुक्ति के लिए ज्ञान आवश्यक है।
" जीव-ईश् कल्पना रही,सो सकल विलाय गई।"
मैं मैं नहीं, इसलिए तू तू नहीं,
मैं में तू, इसलिए तू में मैं,
तू तू नहीं और मैं मैं नहीं,
तू में मैं और मैं में तू रही,
यही मिल सब वेद गहि,
मैं और तू दो नहीं,
मैं ही तू कही,
संशय तब रही,
जो तब था,
वो अब नहीं,
जो अब हैं,
वो तब नहीं,
सत् सत् कही,
असत् भी
नहीं।
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